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| Tuesday 18 November, 2008 |
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Beauti OF Moon
रात्रि का प्रथम प्रहर
मैं बएथा ( सीट) अपने छ्त पर
कल्पना के सागर मे डूबा देखता चंद्रमा का सॉंदर्या
कितना प्यारा सॉंदर्या कितना प्यारा सॉंदर्या
अजब की छःटा है पयरि ( लव्ली ) गजब की चितवन है नयरीी
लगा कर मूख मे रंगो की रोलिया बहुत डेऱ सारी
मैं सॉंदर्या पान कर देखता टकटकी लगा कर
कितना ............
एन्हि खयालो मे खोया मैं झट से उतरा छत से मै लिया थाला पानी भर कर
मैं तो रहा अवाक हो सुख से विहबल
प्रतिबिंबित हो रहा चंद्रमा ताली के पानी पर
चूम लिया पानी को म चंद्रमा समझ्ः कर
कितना .......................
मेरे प्यारे बंदू बांधो भूल मेरी मत मन पर लाना
मत हसना यह बात समझ कर
गलती मैने कर डाली सॉंदर्या देख कर
कितना ..............................
राकेश राय
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